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Showing posts from April, 2024

गमछे की आत्मकथा (व्यंग्य)

        गमछे की आत्मकथा (व्यंग्य)       हाँ तो साहब मैं गमछा हुँ । वही गमछा जो कभी आपके कटिप्रदेश  की तो कभी उत्तर प्रदेश  की शोभा बढाता हुँ । गमछा याने पटुका और आधुनिक लोगों का स्टाल भी मै ही हुँ । रुमाल मेरा छोटा भाई है वो केवल उस समय ही आप की लाज बचा पाता है जब आपकी नाक से कुछ बाहर आने का प्रयास कर रहा होता है । हम चूंकि बड़े भाई है इसलिए रुमाल के द्वारा किये जाने वाले कार्यों के अलावा भी आपकी दैनिक जिंदगी में आपके साथ होते है । वैसे हमारा परिवार बहुत बड़ा है । दस्तार और पगड़ी के साथ ही साथ कफन भी हमारे परिवार के सदस्य है । धोती और साड़ी हमारे परिवार में सबसे बड़ी बहनें है । उपयोग की दृष्टि से देखा जाए तो आप अपने घर में अधोवस्त्र में हों और कोई आ जाए तो आप तुरन्त ही हमारी शरण में आ जाते है । चिलचिलाती धूप में खोपड़ी बचानी हो तो आप का हमसे अच्छा साथी और कौन हो सकता है । साहब आज कल लोग अच्छे कामों से अधिक गलत काम करते है इसलिए उन्हें मॅुह भी छुपाना होता है बस ऐसे लोग दिन हो या रात मुझे अपने मुॅह लपेटे हुए आप को यहाॅ-वहाॅ दिख जाऐंगे । ...

लाऊडस्पीकर

          इस छोटे से कस्बे में सभी ओर अमन और शांति थी । अब्दुल, सविता को बहन मानता था, सुखिया, रज्जाक को चच्चा कहता था और गफ्फुर व मनोहर की दोस्ती की मिसाले दी जाती थी । जूते गाॅंठने वाला गोविन्द अक्सर पं. रामदीन की दालान मे ही सो जाया करता था । इस गाॅंव में शायद ही कोई किसी की जाति पूछता हो । भला हो सरकारी कागजों का उनसे ही जाति का पता चलता था । ऐसा भी बिल्कुल नहीं था कि अब्दुल, गफ्फूर और रज्जाक दाढ़ी न रखते हो या मस्जिद की सीढ़ियाॅं न चढ़ते हो । सविता, रेखा भी करवा चौथ से लेकर होली तक के त्यौहार ना मनाती हो या सुखिया और मनोहर नवरात्रि में उपवास न रखते हो । इस कस्बे में सभी अपने धर्म का बरसों से पालन करते हुए दूसरों का आदर करते रहे थे । जब सविता के बच्चे की तबियत खराब हुई तो वो उसे पास की मजार पर झाड़ा लगवाने ले गई । अब्दुल ने भी उसके लिये हनुमान जी को नारियल चढ़ाना कबुला था ।            इस कस्बे में बरसों से खाली पड़े जमीन के टुकड़े पर बहुत सोच-समझ कर एक ओर मंदिर और दूसरी ओर मस्जिद का निर्माण सभी लोगाें ने मिल-जुल ...

शराबी की आत्मकथा

शराबी की आत्मकथा          हाँ मैं शराबी हूँ। लेकिन आप ये भी तो सोचो कि कोई आदमी जन्म से शराबी नहीं होता। बस मैं भी जन्म से शराबी तो था नहीं, बस बनते-बनते बन गया। आपने अनेकों महान लोगों की आत्मकथाएँ पढ़ी होंगी, लेकिन कभी किसी शराबी की आत्मकथा पढ़ी क्या ? आपकों ये बिलकुल नहीं मालुम हो पाया है कि कोई शराबी, शराबी बने रहने के लिए कितनी परेशानियाँ झेलता। आप यह भी नहीं जानते कि कोई शराबी किन हालातों में जीता है और कब मर जाता है। आज मैं अपनी आत्मकथा लिख कर आपको यह बताने का प्रयास करूँगा कि हम शराबी सही लेकिन इंसान हैं। ये और बात है कि नशें में कभी-कभी अलग दिखने लगते हैं।          मेरा मानना है दुनिया में पाँच प्रतिशत लोग हैं जिन्होंने ‘‘मय नहीं चखी।’’ हाँ तो मेरे पंच्चानबे प्रतिशत शराबी दोस्तों। ये कहानी अक्सर जवानी के साथ ही प्रारम्भ होती है। ऐसा ही मेरे साथ भी हुआ। किसी महफिल में कुछ वरिष्ठ शराबियों के साथ बैठ कर उनके आग्रह पर मैंने पहली बार थोड़ी-सी चखी। अजीब कसैला-सा स्वाद, गले को तेजाब सी चीरती हुई और बदबू से भरा मुंह। कुछ देर में दिमाग सा...

पंछी उवाच

                                     पंछी उवाच                          ये जंगल बहुत ही अच्छा और सुंदर था । कल-कल करती नदियॉ , हरे-भरे पेड़ों से लदे पहाड़ और जानवरों की बहुतायत । हम जानवरों को सब कुछ इसी जंगल से ही मिलता था । इस जंगल की खासियत यह थी कि अभी इसमें दो पैरों पर चलने वाले जानवरों की घुसपैठ कम ही थी । वैसे भी वे दो पैर पर चलने वाले जानवर अपने लिए अलग ही तरह के कांक्रीट के जंगल बना कर रहते है । हम जानवरों को यदि सबसे अधिक ड़र लगता है तो बस इन्हीं दो पैरों पर चलने वाले जानवरों से ।  ये जानवर सीमाऐं बनाते है , हथियारों का प्रयोग करते है और सबसे बड़ी बात वे हमारे साथ ही साथ अपनी जाति के भी दुश्मन होते है । इन जानवरों में से कभी कभार ही कुछ जानवर इस जंगल में दिखते थे । उनके दिखते ही हम सब जानवर एक दूसरे को इशारा कर देते और छुप जाते ।      हमारे जंगल में भालू दाद...