गमछे की आत्मकथा (व्यंग्य)
गमछे की आत्मकथा (व्यंग्य) हाँ तो साहब मैं गमछा हुँ । वही गमछा जो कभी आपके कटिप्रदेश की तो कभी उत्तर प्रदेश की शोभा बढाता हुँ । गमछा याने पटुका और आधुनिक लोगों का स्टाल भी मै ही हुँ । रुमाल मेरा छोटा भाई है वो केवल उस समय ही आप की लाज बचा पाता है जब आपकी नाक से कुछ बाहर आने का प्रयास कर रहा होता है । हम चूंकि बड़े भाई है इसलिए रुमाल के द्वारा किये जाने वाले कार्यों के अलावा भी आपकी दैनिक जिंदगी में आपके साथ होते है । वैसे हमारा परिवार बहुत बड़ा है । दस्तार और पगड़ी के साथ ही साथ कफन भी हमारे परिवार के सदस्य है । धोती और साड़ी हमारे परिवार में सबसे बड़ी बहनें है । उपयोग की दृष्टि से देखा जाए तो आप अपने घर में अधोवस्त्र में हों और कोई आ जाए तो आप तुरन्त ही हमारी शरण में आ जाते है । चिलचिलाती धूप में खोपड़ी बचानी हो तो आप का हमसे अच्छा साथी और कौन हो सकता है । साहब आज कल लोग अच्छे कामों से अधिक गलत काम करते है इसलिए उन्हें मॅुह भी छुपाना होता है बस ऐसे लोग दिन हो या रात मुझे अपने मुॅह लपेटे हुए आप को यहाॅ-वहाॅ दिख जाऐंगे । ...